*🌲🌲🌲कबीर, जब तक भक्ति सकामना, तब लग निष्फल सेव।*🌲🌲🌲
कहैं कबीर वह क्यों मिले, निष्कामी निज देव।।
> सरलार्थ:- जब तक भक्त स्वार्थ पूर्ति के लिए भक्ति करता है। कभी कार माँगता है, कभी कोठी। तब तक उसकी सेव अर्थात् पूजा व्यर्थ है। परमेश्वर कबीर जी समझा रहे हैं कि ऐसे साधक को वह परम पुरूष प्राप्त नहीं होता। केवल आत्म कल्याण के लिए भक्ति करने वाले को संसारी लाभ तथा मोक्ष दोनों मिलते हैं।
उदाहरण:- जैसे किसान गेहूँ की फसल उगाता है। उसका उद्देश्य भुष प्राप्त करना नहीं होता। उसका उद्देश्य जीवनदाता अन्न गेहूँ प्राप्त करना होता है। फिर भुसा तो अपने आप ही प्राप्त हो जाता है। यदि किसान भूसा प्राप्त करने घास बीजकर सर्व लाभ की इच्छा करे तो वह व्यर्थ है। इसी प्रकार ऐसी भक्ति करें जिसका उद्देश्य मोक्ष प्राप्ति हो, उससे सांसारिक लाभ भी अवश्य मिलेंगे, वे तो भक्ति के ठल च्तवकनबज होते हैं अर्थात् भक्ति के साथ मुफ्त मिलते हैं।
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